पातंजल योग दर्शन में ईश्वर

 

मंजू सिंह ठाकुर

विभागाध्यक्ष, योग एवं दर्शन विभाग, अग्रसेन महाविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत।

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ABSTRACT:

योग दर्शन में ईश्वर का एक महत्वपूर्ण स्थान है। योग दर्शन में ईश्वर को विशेष पुरूष (विशेष आत्मा) के रूप में परिभाषित किया गया है। पातंजल योग दर्शन का ईश्वर कर्मो और उनके फलो से अतीत है। योग दर्शन में ईश्वर साधना का साधन है, लक्ष्य नहीं। ईश्वर का मुख्य कार्य साधक की सहायता करना है। विशेषकर मन को एकाग्र करने में। योग दर्शन में ईश्वर के अस्तित्व का उद्देश्य है ईश्वर के प्रति भक्ति जब हम करते है तब हमारा चित्त शुध्द हो जाता है और समाधि प्राप्ति का मार्ग सहज और सरल हो जाता है। पातंजलि योग दर्शन में ईश्वर का अस्तित्व को एक साधन के रूप में स्वीकार किया जाता है। जिससे हमारी चित्त वृत्तियों का निरोध होता है, और समाधि की प्राप्ति होती है। योग दर्शन में ईश्वर विशेष पुरूष कहने से तात्पर्य है जो कभी जन्म, मृत्यु, दुःख और कर्मो से बंधा ही नहीं है। योग का अंतिम उद्देश्य ही आत्मा को ईश्वर से जोडना है, योग के जितने भी मार्ग है भक्ति मार्ग, कर्म मार्ग, ज्ञान मार्ग ये सभी हमें ध्यान और समाधि की ओर ले जाते है। ध्यान और समाधि की अंतिम अवस्था में साधक को ईश्वर की अनुभूति होती है। योग साधना का मार्ग है और ईश्वर उस मार्ग का परम लक्ष्य है। जब साधक योग के मार्ग पर आगे बढ़ता है तब बहिरंग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार) के माध्यम से मन और शरीर शुध्द होता है, क्योंकि ईश्वर के चिंतन के लिए मन का शुध्द और शांत होना जरूरी है। जब साधक नियमित साधना करता है तब उसका अहंकार धीरे धीरे घटने लगता है और मन के भीतर ईश्वर का अनुभव होने लगता है। योग बिना ईश्वर के अधूरा है और ईश्वर का अनुभव योग के बिना कठिन है। प्रस्तुत शोध-आलेख में हमने योग दर्शन में ईश्वर के इसी स्वरूप को विस्तृत रूप से बताने का प्रयास किया है। इस प्रकार हम कह सकते है कि योग हमें केवल शारीरिक और मानसिक रूप से ही स्वस्थ नही करता बल्कि ईश्वर के साथ गहरी जुड़ाव की अनुभूति भी कराता है।

 

KEYWORDS: साधना, एकाग्र, अनुभूति, चिंतन, अहंकार।

 

 


INTRODUCTION:

अन्य विधाओं की भांति योग विधा के प्रवाह का मूल स्त्रोत भगवान शंकर माने जाते हैं। वेद के अनुसार - ‘शंकर ईशानः सर्व विधनामः’ अर्थात् सब विधाओं के स्वामी शंकर है। योगियों के इन्हें आदर्श, योगी माना जाता है। समस्त विधाओं के स्वामी होने के साथ साथ वह ‘ईश्वरः सर्वभूतानां’ सभी प्राणियों के ईश्वर है। विश्व में करोड़ो वर्षो में न जाने कितने महापुरूष अवतरित हुए होंगे, जिन्होंने परमगुरू भगवान आदिनाथ शंकर से मूल प्रेरणा लेकर अपने समय के जीवों को परमधर्म का उपदेश दिया होगा उसी कार्य को जीवों के हितों की कामना से प्रेरित होकर पातंजलि ने अपने योगदर्शन द्वारा करने का निश्चय किया है।1

 

योग दर्शन के प्रवर्तक महर्षि पातंजलि को माना जाता है। योग की परिभाषा देते हुए महर्षि पतंजलि कहते हैं –

 

‘योग्श्चित वृत्ति निरोधः योगः।‘

अर्थात - चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।2

 

ईश्वर की अवधारणा पातंजल योगदर्शन में पुरूष विशेष के रूप में की गयी है। ईश्वर को प्रकृति तत्व के अन्तर्गत नहीं रखा जा सकता; क्योंकि प्रकृति जड़ है किन्तु ईश्वर चेतन है। प्रकृति परिणामी है, किन्तु ईश्वर परिणामी नहीं है। यह ईश्वर ‘पुरूष’ भी नहीं है क्योंकि सभी पुरूष चिन्मात्र है, इसीलिए उनमें ‘ईश्वर’ और ‘अनीश्वर’ का भेद करना संभव नहीं है।3

 

ईश्वर का उल्लेख पतांजल योगसूत्र में समाधि पाद में आता है।

 

“ईश्वर प्राणिधानाद् वा।“ (1 : 23)

 

अर्थात - ईश्वर प्राणिधान से समाधि की प्राप्ति होती है।4 यहां महर्षि पतंजलि एक वैकल्पिक साधन के रूप में ईश्वर की भक्ति या समर्पण को प्रस्तुत करते है।

 

‘‘क्लेश कर्म विपाकाशयैरपरामृष्टः पुरूष विशेष ईश्वरः।“ (1 : 24)

 

अर्थात - ईश्वर वह विशेष पुरूष है जो क्लेश (दुःख), कर्म विपाक (फल) और संस्कारों से अतीत है।5 यहां ईश्वर की प्रमुख विशेष कहा गया है एक विशेष आत्मा जो सामान्य जीवों से भिन्न है।

 

“तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्’’ (1 : 25)

 

उस ईश्वर में सर्वज्ञता का बीज अनंत रूप में विद्यमान है।6 इससे ईश्वर को सर्वज्ञ बताया गया है।

 

“स पूर्वेषामपि गुरूः कालेनानवच्छेदात्।“ (1 : 26)

 

वह ईश्वर अतीत के सभी आचार्यो से भी पहले गुरू है, क्योंकि उनका अस्तित्व काल से परे है।7 इसी प्रकार प्रथम अध्याय के 27वें श्लोक में कहते है –

 

“तस्य वाचकः प्रणवः” (1 : 27)

 

अर्थात उस ईश्वर का प्रतीक नाम ‘ऊँ’ है।8 इसलिए ‘ऊँ’ का जप और उसके अर्थ का ध्यान करना चाहिए।9

 

योगदर्शन के अनुसार ईश्वर ‘पुरूष विशेष’ है। यह सामान्य पुरूष प्रकृति पुरूष और मुक्त पुरूष से भी भिन्न हैं। ‘‘ईश्वर सर्वदा क्लेशादि से असम्बध्द होता है जबकि मुक्त पुरूष क्लेशयुक्त होकर साधना के द्वारा मुक्त हुए हैं और प्रकृतिलीन पुरूष आगामी जन्म में बन्धन प्राप्त कर, सकता है।10 प्रकृतियों को ‘प्राकृतिक बन्ध’ होता है क्योंकि आठों प्रकृतियों में इनका अभिमान रहता है। विदेह योगियों को शब्दादि-विषयों में आसक्ति (राग) होने के कारण ‘वैकारिक बन्धन’ होता है और गृहस्थों को कर्मदान अध्ययन आदि में अनुराग होने के कारण ‘दाक्षिणिक बन्ध’ होता है लेकिन ईश्वर सदा ही मुक्त और सदा ही ईश्वर है।“11

 

सर्वज्ञता के आधार पर भी ईश्वर अन्य पुरूषों से भिन्न है। जीवात्माओं का ज्ञान सातिशय होता है, उसके ज्ञान में ‘न्यूनाधिक्य’ देखा जाता है। ईश्वर का ज्ञान निरतिशय होता है। ‘तत्र निरतिशयं सर्वज्ञ बीजम्।‘ अर्थात अतीत, अनागत और वर्तमान इनसे व्यष्टि तथा समष्टि रूप से वर्तमान अल्य या अधिक अतीन्द्रिय ज्ञान देखा जाता है वही सर्वज्ञबीज अर्थात् सार्वज्ञय का अनुमापक है। यह ज्ञान अल्प, अधिक और भी अधिक इस प्रकार से बढ़कर जिस पुरूष में सर्वज्ञबीज की प्राप्ति हुई है, वही सर्वज्ञ है और पुरूष विशेष भी।

 

ईश्वर और जीव के संबंध को बतलाते हुए विज्ञान भिक्षु ने कहा है कि ‘स प्रवेषामपि गुरूः कालेननावच्छेदात’ योगसूत्र में ‘गुरू’ पद का अर्थ ‘पिता’ है।12 उनकी दृष्टि में प्रत्येक नूतन सृष्टि के आदि में ईश्वर, ब्रम्हा, विष्णु और महेश्वरादि को उत्पन्न करता है, क्योंकि वही उनका पिता है। स्वयं कालातय में वर्तमान में रहने के कारण एकमात्र ईश्वर ही उनका जनक है, भिन्न-भिन्न ईश्वर नहीं। श्रुतियाँ भी जीव एवं ईश्वर के जन्य-जनक भाव सम्बन्ध को प्रतिपादित करती है, अतः सिद्ध हुआ कि ईश्वर अंशी है तथा जीव अंश है इन असंख्य जीवों के साथ ईश्वर सम्बन्ध, पिता-पुत्र एवं अग्नि-विस्फलिंग की तरह अविभाज्य सम्बन्ध है। जैसे एक दीपक सहस्त्र दीपों को प्रज्वलित करता है, वैसे ही एक ईश्वर असंख्य जीवों को उत्पन्न करता है।

 

योगशास्त्र में यह बतलाया गया है कि ईश्वर वह महाप्रभु है जो अपनी कृपा से उपासकों के पाप और दोषों को दूर करके उन भक्तों के लिए महत्वपूर्ण योगमार्ग को सरल बना देता है, जो वस्तुतः ईश्वर के उपासक है, उनको परमपिता परमेश्वर की सर्वोच्च विभूति, हृदय की शुद्धता एवं बुद्धि का प्रकाश होता है। ईश्वर अपनी भक्ति से प्रसन्न होकर भक्त के पथ से क्लेशादि सभी विघ्नों को दूर कर देता है, तब साधक का विक्षिप्त चित्त शनैः शनैः एकाग्र होने लगता है और साधक का ईश्वर चिन्तन की ओर अधिक झुकाव होने लगता है। ईश्वर के ध्यान का अभ्यास करने से जब चिन्ता एकाग्रता की उत्कृष्टावस्था को प्राप्त करता है, तब भक्त को स्वरूपानुभूति होती है।

 

प्रेमस्वरूप भक्तिरूप प्राणिधान से ईश्वर योगियों पर कृपा करता है, जिससे योगी को समाधि और कैवल्य की शीघ्रतम प्राप्ति हो जाय। ईश्वर की कृपा से ही साधक को सभी प्रकार की बाधाओें का नाश होता है। ‘राजमार्तण्डवृत्ति’ में भी कहा गया है कि ईश्वर योगी की भक्ति से प्रसन्न होकर ‘अन्तराय’ रूप अविधा इत्यादि पञचविध क्लेंशो को दूर करके उस योगी के लिए अच्छी प्रकार की समाधि का बोध कराता है। इस प्रकार ईश्वर योगी की समाधि-सिद्धि में अत्यधिक सहायक होता है। योग की सिद्धि में तथा कैवल्य लाभ के लिए भगवत कृपा सर्वोत्तम उपाय है।13 ‘श्वेताश्वतर-उपनिषद में भी ईश्वर का वर्णन करते हुए कहते है -

 

“अनाधनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्त्रष्ठीरमनेक रूपम्

विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्येत सर्वपाशैः।।“

 

अर्थात - दुर्गम संसार के भीतर प्राप्त आदि-अन्त से रहित, समस्त जगत को सब ओर से घेरे हुए एक अद्वितीय परमदेव परमेश्वर को ज्ञात्वा जानकार मनुष्य समस्त बन्धनों से सर्वथा मुक्त हो जाता है।14

 

योगदर्शन में सांख्य के तत्व विचार को पूर्णतः स्वीकार किया गया है। सांख्य दर्शन में प्रकृति और पुरूष के सान्निध्य से विश्व का विकास माना गया है। योगदर्शन में प्रकृति और पुरूष के संयोग को ही विश्व सृष्टि का कारण माना गया है। सांख्य दर्शन की तरह योगदर्शन भी प्रकृति को विश्व का उपादान कारण और पुरूष को निमित या अपरिणामी कारण मानता है, लेकिन योगदर्शन में सामान्य पुरूषों के साथ-साथ ‘पुरूष विशेष’ या ईश्वर की मान्यता है। अब प्रश्न यह है कि यदि प्रकृति और पुरुष के साथ-साथ ‘विशेष पुरूष' का भी भाव है तो उस ‘पुरूष विशेष’ ‘ईश्वर’ की विश्व सृष्टि में क्या भूमिका है। इस जिज्ञासा के उत्तर में यह कहा जा सकता है कि योग दर्शन में ईश्वर को विश्व का निमित्तकारण माना गया है। योग दर्शन में प्रकृति ही विश्व का उपादन कारण है। जब प्रकृति और पुरूष का संयोग होता है तभी जगत का विकास होता है। यहाँ ध्यान देने की बात है कि जहाँ सांख्य यह मानता है कि प्रकृति की क्रियाशीलता के कारण प्रकृति के साथ निष्क्रिय पुरूष का संयोग होता है, वहाँ योग की मान्यता कि परस्पर पृथक तत्व प्रकृति एवं पुरूष में संयोग कराने में ईश्वर की सहायक होता है। इस तरह ईश्वर जगत का निमित्त कारण है। इस तथ्य की पुष्टि वाचस्पत्ति मिश्र एवं विज्ञान भिक्षु भी करते हैं। वाचस्पति मिश्र के अनुसार प्रकृति ईश्वर से अधिष्ठित होकर सृष्टि के विकास की प्रक्रिया और प्रलय का कार्य पूर्ण करती है। इनके अनुसार प्रकृति की साम्यावस्था में क्षोभ उत्पन्न होने के कारण ईश्वर सृष्टि का उपबोधक है। विज्ञानभिक्षु ने स्पष्टतः कहा है कि प्रकृति के वैषम्य (अर्थात सृष्टिकाल) से होने वाला परिणाम रूप जो क्षोभ उत्पन्न होता है वह ईश्वर की इच्छा से होता है।15

 

निष्कर्ष:-

योगदर्शन में वर्णित ईश्वर की अवधारणा की उपर्युक्त व्याख्या के आलोक में हम इस निष्कर्ष पर आते है कि पतंजलि के अनुसार ईश्वर एक विशेष पुरूष है, ऐसा पुरूष जो क्लेश, कर्मफल और वासनाओं से परे है। उसका जगत से कोई सम्बन्ध नहीं है। योगदर्शन में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि प्रकृति से उसका कोई सम्बन्ध है या नहीं, लेकिन हम ऐसा अनुमान करते है कि ईश्वर के सान्निध्य के कारण प्रकृति अपने स्वभाव के कारण क्षुब्ध होता है जैसा कि गीता इत्यादि ग्रंथों में वर्णित है तो बुद्धि आदि प्राकृतिक विकारों का उद्य भी होगा और फिर उस पर सुख-दुःख आदि का प्रभाव पडता हो या न पड़ता हो, परन्तु वह कम से कम अन्तः करण युक्त तो हो ही जाएगा और इस प्रकार जगत का साक्षी होगा।

 

दूसरी बात यह हो सकती है कि सान्निध्य रहते हुए भी प्रकृति इस पुरूष विशेष के सामने विक्रियाशील न हो, या यह पुरूष विशेष उसकी विक्रियाओं से रंजित ना हो। यदि ऐसा होता है तो जिन बातों को लेकर ईश्वर की उपासना की जाती है उनमें से एक भी सिध्द न होगी। जब ईश्वर बुद्धि से युक्त होगा ही नहीं, तब न उसे सुख-दुःख की अनुभूति होगी और न ही उसमें दया, करूणा का उदय होगा। कोई व्यक्ति कितना ही आर्त होकर पुकारे, ईश्वर उसके कृन्दन से प्रभावित नही हो सकता। उसके पास किसी की सहायता करने का कोई साधन नहीं है। ऐसे ईश्वर की कल्पना करने से क्या लाभ होगा।

 

यहाँ ईश्वर की सत्ता अस्वीकार नहीं की जा रही है, परन्तु योग दर्शन ने ईश्वर का जो चित्र खींचा है, वह यथार्थ प्रतीत नहीं होता। डॉ. सम्पूर्णानन्द की मान्यता है कि सांख्य की तरह योगदर्शन में भी ईश्वर के समावेश की कोई अनिवार्य आवश्यकता नहीं थी। लेकिन ‘योगसूत्र’ का प्रणयन महात्मा बुध्द के बाद का है। इसलिए इसमें ईश्वर की अवधारणा का समावेश किया गया है।

 

जिस प्रकार सांख्य दर्शन में जगत की व्याख्या प्रकृति-पुरूष के संयोग से की गई है ईश्वर की कोई अनिवार्यता नहीं है। उसी प्रकार आष्टांगिक योग की प्रक्रिया में ईश्वर की कोई नितान्त अनिवार्यता नहीं है। ईश्वर की अवधारणा से योग प्रक्रिया सरल हो जाती है।

 

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1.    डॉ. सम्पूर्णानन्द, योगदर्शन, पृ. 62 - 63

2.    पातंजलि योग सूत्र: स्वामी विवेकानंद, पृ. 09, 1/2, प्रभात पेपर बैक्स, नई दिल्ली, संस्करण 2023, 15BN978.93.5521355.6

3.    पातंजलि योग सूत्र: स्वामी विवेकानंद, पृ. 26, 1/23, प्रभात पेपर बैक्स, नई दिल्ली, संस्करण 2023, 15BN978.93.5521355.6

4.    पातंजलि योग सूत्र: स्वामी विवेकानंद, पृ. 26, 1/23, प्रभात पेपर बैक्स, नई दिल्ली, संस्करण 2023, 15BN978.93.5521355.6

5.    पातंजलि योग सूत्र: स्वामी विवेकानंद, पृ. 26, 1/24, प्रभात पेपर बैक्स, नई दिल्ली, संस्करण 2023, 15BN978.93.5521355.6

6.    पातंजलि योग सूत्र: स्वामी विवेकानंद, पृ. 27, 1/25, प्रभात पेपर बैक्स, नई दिल्ली, संस्करण 2023, 15BN978.93.5521355.6

7.    पातंजलि योग सूत्र: स्वामी विवेकानंद, पृ. 28, 1/26, प्रभात पेपर बैक्स, नई दिल्ली, संस्करण 2023, 15BN978.93.5521355.6

8.    पातंजलि योग सूत्र: स्वामी विवेकानंद, पृ. 28, 1/27, प्रभात पेपर बैक्स, नई दिल्ली, संस्करण 2023, 15BN978.93.5521355.6

9.    पातंजलि योग सूत्र: स्वामी विवेकानंद, पृ. 28, 1/28, प्रभात पेपर बैक्स, नई दिल्ली, संस्करण 2023, 15BN978.93.5521355.6

10. योग दर्शन: व्याख्याकार हरिकृष्णदास गोयन्दका, पृ. 57

11. पातंजलि योगदर्शन: स्वामी रिहरानंद (भाष्य), पृ. 69

12. तत्त्व वैशारदी: विज्ञानभिक्षु, 22, चौरवम्बा संस्कृत सीरिज, वाराणसी

13. ईशादि, नौ उपनिषद, व्याख्याकार - हरिकृष्णदास गोयन्दका पृ.-487 प्रकाशक- गोविन्द भवन-कार्यालय, गीता प्रेस, गोरखपुर - 273005 सं. 2051, चौदहवॉं संस्करण।

 

 

Received on 04.10.2025      Revised on 24.10.2025

Accepted on 08.11.2025      Published on 14.11.2025

Available online from November 25, 2025

Int. J. of Reviews and Res. in Social Sci. 2025; 13(4):237-240.

DOI: 10.52711/2454-2687.2025.00035

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